अंतरास्टी महिला दिवस

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संगीत सुभाष

‘ई बिहाने-बिहाने मोबाइल ले के का बइठि गइनीं? जाईं, थोरे मटर के चेंवटा उखारि ले आईं। निमोना खाए के मन करता आ गाइ के हरिअरिओ हो जाई।’ फुलेसर के मलिकाइन कहली।
‘तनकी भर रूको। अबहिंए जाता हूँ। तनी फेसबुक पर लिखि लेने दो। आज अंतरास्टी महिला दिवस है’- फुलेसर कहलें।
‘ ई का ह जी?’- मलिकाइन पूछली।
‘आरे एतना त हमहूँ नहीं जानता हूँ त तुमको का बतलाऊँ। सबलोग फेसबुक पर लिख रहे हैं तो हमहूँ कुछ लिख देता हूँ।’-फुलेसर कहलें।
‘ जब जानते नइखीं त समय का हेवान करतानीं? जाईं, जाईं, हऊ ले आईं कि रसोई बनो।’- मलिकाइन कहली।
‘तू बउचट का बउचटे रह गई। तुझको नहीं बुझाएगा। सबेरे- सबेरे कपार खाने लगी। हटो सोझा से।’ फुलेसर डँटलें।
मलिकाइनो के पारा चढ़ि गइल आ लगली हाथ से मोबाइल छिने। छिना झपटी में मोबाइल गिर गइल आ चकनाचूर हो गइल। मोबाइल फूटल देखिके फुलेसर आव देखलें ना ताव, आठ- दस लात हुँमचा दिहलें। मलिकाइन कोना में बइठि के भोंकार पारि के रोवे लगली।
फुलेसर रिसिआइल उठलें आ मटर के चेंवटा उखारे चलि देहलें। साथे- साथे कहतो जासु-‘ हम कह रहा था कि आज अंतरास्टी महिला दिवस है। कुछ लिख लेने दो त नहीं मानी। मन गया नू महिला दिवस?
✍संगीत सुभाष,
मुसहरी, गोपालगंज।

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