कटाक्ष

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कटाक्ष

होई तोहार सितुहा के हाल

अबो खेतवा चरिये जइबऽ
खुरी धुर खुरछरिये जइबऽ

मटर चना हरियर हरियर
लह चह लागत बाटे दीयर
खइबऽ कम लसरिये जइबऽ

का हवऽ सरकारी साँढ़
बिओ बिगल होई डाँड़
हकनिहार के फरिये जइबऽ

फगुओ खाती तऽ रहे दS
जेतने लSहत बा लहे दS
आ कि लील ढेंकरिये जइबऽ

लइकन के पाले परलऽ ना
एह से कतहीं तू़ हरलऽ ना
परबऽ फेर में त उजरिये जइबऽ

जाई बतीसी भीतराम पुर
अलगे आँखी में माटी धूर
कँहरल नइखऽ कँहरिये जइबऽ

सस्ता खून आ महंगा पानी
छतीस घाट के पीअलऽ पानी
टिपुर पर गिरबऽ त मरिये जइबऽ

होई तोहार सितुहा के हाल
बवबऽ मुँह ना पीअबऽ दाल
कुलाँच मारल बिसरिये जइबऽ
आ फागुन में तूँ कबरिये जइबऽ।

विद्या शंकर विद्यार्थी

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