कुजाति

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ई ओ बेरा के कहानी ह, जवना बेरा सामाजिक नियम तूरला पर तूरेवाला के जाति से निकाल दिहल जात रहे आ कुजाति कहल जात रहे। ओकरा साथे खाइल-पिअल, उठल-बइठल आ बातचीत तक ले समाज के लोग बन क देत रहे। कुजाति छँटइला के पीरा आ मानसिक कष्ट के अन्दाजा दोसर केहू ना लगा पावे, छँटाएवाला के छोड़ के। झींगुर अइसहीं कुजाति छँटा गइलें आ अइसन खातिर छँटइलें जवना में रत्तियो भर उनुके दोष ना रहे।
झींगुर के चार बेटा पर एगो बेटी गुलबिया रहे। झींगुर दस बिगहा के जोतनिया रहलें। दुआर पर दूगो बरियार बैल आ दूध-दही खातिर भँइस हमेशा रहसँ। समाजो में झींगुर के बढ़िया इज्ज्त रहे। गाँव के कवनो पंचइती उनुका बिना रहले ना हो पावे। ओही झींगुर के बेटी गुलबिया आन गाँव का एगो चरवाह का संगे भागि गइल। बिहाने- बिहाने भर गाँव मुँहामुँहीं चर्चा होखे लागल- गुलबिया भागि गइल, गुलबिया भागि गइल।
गाँव में हजार मुँहे हजार तरह के बात होखे लागल। केहू झींगुर के दोष देउ त केहू गुलबिया के दोष देउ। झींगुर के दोष ई कि लइकी के सम्हार के ना रखलें आ गुलबिया के दोष ई कि बाप- महतारी कि इज्जत के तनिको खेयाल ना कइलसि आ एगो निपट गँवार चरवाह का साथे भागि के झींगुर का साथे पूरा गाँव का मुँह पर करिखा पोति दिहलसि। केहू झींगुर का दुआर पर जा के हालचाल ना लेउ कि ऊ कवना हालत में बाड़ें।
आखिर गाँव के सबसे समझदार अदिमी सीताराम काका झींगुर का दुआर पर गइलें। दुआर पर सन्नाटा पसरल रहे। झींगुर एगो टुटही पलानी में लुकाके बइठल रहलें। आँखि गंगा-जमुना के धार भइल रहे। दुआर पर से सीताराम काका बोललें-‘कहाँ बाड़S हो झींगुर?’
सीताराम काका के आवाज सुनिके झींगुर पलानी से बहरी अइलें आ आवते पकला आम का तरे उनका गोड़ पर गिरके दुनू गोड़ छानि लिहलें। जेतना दरद भीतरी टिसत रहे, डेहरी के पेहान खोलला पर अनाज बहरी गिरला का तरे बाहर गिरे लागल। झींगुर भोंकार पारि के रोवे लगलें आ एकसँसिए कहल शुरू कइलें- ‘आरे, ए काका! गुलबिया त हमरा के कवनो ओर के ना छोड़लसि हो। सगरी इज्जत के माँटी मिलाके पलटापुर का फतिंगना का बेटा का संगे भागि गइल। हम ना जननीं कि ई चरवाही में इहे करे जात बिया। असवें धूमधाम से ओकर बिआह करेवाला रहनीं हँ। सोचले रहनीं हँ कि चार बेटन पर एके गो बेटी बिया, तनी करजो-उआम क के नीमना घरे बिअहबि। सब सोचल बालू की भिति लेखाँ ढहि गइल। चार- चार गो बेटा बाड़े। अब ए कुल्हिन के के पूछी? सब कुँआरे रहि जइहन सन। लोग आ समाज इहे नू कही कि झींगुर के बेटी फलनवाँ का संगे उढ़रि गइल। अब हम जी के का करबि? आजुए फँसरी लगा लेब।’
सीताराम काका उनुके बाँहि ध के बड़ा बरिआई से आपन गोड़ छोड़वलें आ समुझावल शुरू कइलें- ‘देखS झींगुर! बेटी बड़ा संवेदनशील जीव हई। इनका चलते इज्जति बढ़िओ जाला आ गलत डेग उठा लेसु त रसातलो में हलि जाला। गुलबिया समाज के कायदा- कानून तूरिके गइल बिया त ओकरा नीमना- बउरा के फल ओकरे मिली। तहरा त ई बात जिनिगी भर कचोटी। लेकिन, हम भा तू कइओ का सकत बानीं जा? अधिका से अधिका थाना- पुलिस। त ओइमें अउरी मानहानि होई। ए से जवन भइल तवना के बिलवावे के कोसिस करऽ आ हे चार गो छोट- छोट बेटन खातिर पत्थल के करेजा बनावS। कहेवाला त एहूंगा कहेला, अब त समये अइसन बा। चलऽ, मुँह- हाथ धोवS आ सब सम्हारऽ।’
बहुत देर ले सीताराम काका समुझावत रहि गइलें आ झींगुर खाली रोवते रहि गइलें। अगल- बगल गाँव के लोग टाटी लगवले रहे। गाँव भर के लोग कहल कि ए समय में पूरा गाँव तहरा साथे बा। गुलबिया खाली तहरे इज्जत ना रहलसिह। गाँव के सब बेटी गाँव के इज्जति हई। हमनीं के इज्जति गइल बा, दुख आ रिसि त बहुत बा, लेकिन उहे ध के बइठल त नइखीं जा रहि सकत। आपन अउरी काम देखल जरूरी बा आ तुहूँ देखS। सीताराम काका आ गाँव का लोगन की बाति से झींगुर का कुछ तिहा परल आ गमछा से आँखि पोंछे लगलें।
सब होत रहे, लेकिन झींगुर के आपन खास पट्टीदार ललई कुछ ना बोलसु। कबो- कबो एने-ओने मुँह घुमाके मुस्किआइयो देसु, जइसे ऊ भीतरे- भीतर कवनो चउरंच रचत होखसु। दुइए दिन बाद ऊ चउरंच सोझहूँ आ गइल। झींगुर इनार से पानी भरत रहलें। ओही समय ललइयो पानी भरे चहुँपलें। झींगुर के इनार में पानी भरत देखके ललई ठाढ़ हो गइलें। जब झींगुर पानी भरिके इनार पर से हटलें त ललई इनार का जगती पर ठाढ़ होके आपन गगरा इनार में डललें आ झींगुर का ओर हिकारत का भाव से तकलें। झींगुर का कुछ बुझाइल, कुछ ना बुझाइल। बात उहवें खतम हो गइल। दोसरा दिने ललई इनार से पानी भरत रहलें। तले झींगुरो पानी भरे चहुँपलें। झींगुर अबे जगति पर आवहींवाला रहलें तले ललई बोलि परलें- ‘हाँ, हाँ, तनी रूकS। एने कहाँ चढ़ल आवतारऽ?’
झींगुर पूछले- ‘काहें? का बात बा? हमरो त पनिए भरे के बा?’
ललई- ‘भरे के बा त भरि लिहऽ, हमरा भरला का बाद।’
झींगुर- ‘काहें, इनार से एके अदिमी पानी भरेला का?’
ललई- ‘नाहीं, कइयो आदमी पानी भर सकता। बाकिर अब तू हमरा साथे पानी नइख भरि सकत।’
‘काहें?’- झींगुर पूछलें।
‘तू जानते नइखऽ ? ललइयो सवाल पर सवाल दगलें।
‘ना, हम त नइखीं जानत।’- झींगुर कहलें।
‘अब तू कुजाति बाड़S। तहार बेटी बिना बिआहे के उढ़रि गइल बिया। अब तू कबो हमरा साथे इनार से पानी नइखऽ भरि सकत, खाइल- पियल आ उठल- बइठल त अलगे बा।’- ललई एकसँसिए बिना लागलपेट के कहि दिहलें।
सुनते झींगुर का बुझाइल कि भूकम्प आ गइल। चक्कर खाके कटला पेड़ जइसन भुइयाँ गिर गइलें। हाथ से बाल्टी छुटिके डगरत दूर चलि गइल। कुछदेर। बाद होश आइल त कइसहूँ उठलें आ आँखिन में लोर भरले दुआर पर पहुँच त गइलें, लेकिन फिनु से अनहोश हो गइलें। घर से मलिकाइन निकलली आ झींगुर के ई हालत देखिके पुक्का फारिके रोवे लगली। कुछलोग दउरल आइल आ झींगुर के खटिया पर सुताके डागदर बोलावे के उपाय कइल। डागदर साहेब अइनीं, दवा कइनीं।
ओहिदिन के खटिया धइल झींगुर फिनु खटिया ना छोड़लें। मलिकाइन पूछली-‘ई सब कइसे हो गइल ह?’
झींगुर कहलें- ‘ए मलिकाइन, अब हमनीं कुजाति बानीं जा। ललई हमनीं के कुजाति छाँटि दिहले बाड़ें हो। ई कुजाति रहिके जिअला से नीमन इहे बा कि हरमेशा खातिर दुनियाँ छोड़ि दीं।’
मलिकाइन समुझावते रहि गइली। कबहूँ अपना खातिर त कबहूँ चारि गो छोट-छोट लरिकन खातिर जिए के कहते रहि गइली। लेकिन, झींगुर खटिया ना छोड़लें त ना छोड़लें। दवा होते रहि गइल, झींगुर खटिया से बाँस का विमान पर आ गइलें।

✍संगीत सुभाष,
मुसहरी, गोपालगंज।

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