दतुअन

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धन्यवाद, ओ अदिमी के, जे दाँत आ मुँह की सफाई खातिर दतुअन के खोज कइल। ना त, लोग लोग का नियरा जाए का पहिले सइ बेर सोचित कि कहीं 11000 भोल्ट के बसना के करंट छोड़ि दीहें त पराने के अंत हो जाई।
अइसे त दाँत अंगुरियो से धोवा जाला, लेकिन दाँत की सफाई खातिर दतुअन सबसे नीमन जोगाड़ ह। ओद लकड़ी के बित्ता भरके छरका के दतुअन कहल जाला। ई नीम,आम, अमरूद, बबूर, बाँस, महुआ, भँटवास, चिचिरा भा अउर कवनो लकड़ी हो सकता। लेकिन, बर, पीपर आ पकड़ी के दतुवन ना होला। हमरा इहाँ एक जने कहिहें-
‘कहे कबीर एगो लाकड़ चाहीं,
बर, पीपर, पाकड़ नाहीं।’
नीम के दतुअन सबसे नीमन दतुअन ह। कइला पर तनी तीत त लागेला, लेकिन एकरा में कवन आ केतना गुन बा, आजुके वैज्ञानिको लो बतावता। आम त राजा हइए ह, ओकर कहीं उपयोग क लीं। महुआ के दतुअन दाँत के सब बेमारी के दवा ह। दाँत हिलत होखे, पायरिया भइल होखे भा दाँतदरद से बाप-बाप चिल्लात होखीं त पहिले का जमाना में केहू बता दी कि महुआ के दतुअन काहें नइखS करत? भँटवास के दतुअन शुगर रोग के दवा ह। केहू का शुगर के बेमारी होखे, लोग बतावेला कि रोज भँटवास के दतुअन करS आ हप्ता में एकदिन पाँचगो भँटवास के पतई पीसिके पी लऽ, शुगर बाप- बाप करत भगिहें। बबूर त एतना नीमन दतुअन होला कि आजुवो बबूर के नाम ध के तमाम टूथपेस्ट बिका रहल बा। चिचिरा साधूबाबा सबके प्रिय दतुअन ह। ऊ सब कहेला कि चिचिरा के दतुअन आ गंगाजल पियल एके जइसन ह। बाँस के दतुअन कइला के पुरनिया लो मनाही करी। कही कि जेकरा वंश होखे, ओकरा बाँस के दतुअन ना करे के चाहीं। बाँस का दतुअन से कबो- कबो मुँह भा जीभ कटइलो के डर ह।
त, भाईसब! ए तरे से कवनो लकड़ी के बित्ता भरके छरका लेके आ अपना चहुवा(चबाएवाला) दाँतन से कवनो एक ओर लगभग आधा इंच एतना कूँचल जा कि ओने झाड़ू जइसन बनि जा। जवना के हुरा कहल जा। ओही हुरा के दाँत पर बहरी- भीतरी, कोने-अँतरे रगरल जा आ दाँत के चमचम चमका दिहल जा। दाँत चमकवला का बाद दतुअनिया के दाँत से दबाके बीच से फारि दिहल जा, ई चिठ्ठा कहाउ। दुनू हाथे, दुनू ओर से चिठ्ठा पकड़िके रगरि- रगरिके जीभ के सफाई क दिहल जा आ चिठ्ठा के पानी से धोके फेंकि दिहल जा। अब मन फरेश हो जा।
केहू- केहू निमक के खूब मेंहीं पीसि दे आ करुआ तेल में फेटिके दाँत पर रगरिके काम चला ले। लरिका कुल्हि त कउड़ा का राखिए से आपन दाँत करिया क लसन आ कहसन कि देखऽ, हमार दाँत केतना चमकता?
त, एगो ऊ समय रहे कि बिहाने उठते सबका मुँह में सबसे पहिले दतुअन जा आ एगो ई समय बा कि बिहाने उठते सबसे पहिले मुँह में चाय जाता। नब्बे फीसदी भोजपुरिया लो का सबसे पहिले सुरुती चाहीं, बिना कुल्लागलाली के। चाय आ सुरुती ना मिली त डोलोडाल बन हो जाई।
अब त कुक्कूरमुत्ता जइसन उपजल हजारो कम्पनी टूथपेस्ट के एतना ना परचार कइलीसँ कि सभे दतुअन भुला गइल आ पेस्टे से काम चलावे लागल। एक बोलावे, तेरह धावे जइसन हाल बा। रउरा पाकिट में जेतना पइसा बा, ओतने में पेस्ट मिलि जाता। किनीं आ करीं। दतुअन के नाम ले ओरा गइल। अब पेस्ट, ब्रश आ टंगक्लीनर(जीभा) हो गइल।
नवका जमाना आ दतुअनवाला पेड़-खूँट की कमी का चलते फुलेसरो में बदलाव आइल। उहो दतुअन छोड़ि पेस्टे से काम चलावे लगलें। घरभर के अलगे-अलगे ब्रश आ जीभा ले आ दिहलें। पेस्ट के बड़का ट्यूब हमेशा राखल रहे। सभे बिहाने दाँत साफ क ले।
एकदिन फुलेसर के सरहा आ गइलें। उनुका खातिर अलग- ब्रश- जीभा त रहे ना। फुलेसर कहलें कि ले आवतानीं दतुअन। गइलें, भुवर का आम से एगो खूब नीमन छरका तूरि लिहलें आ ले के चले लगलें। भुवर देखलें आ गरम होके पूछि दिहलें-‘ई का हो, फुलेसर भाई? ई छरका काहें तूरलऽ ह?’
फुलेसर कहलें कि जानत नइखS? तहरा सरहा आइल बाड़ें। उनहीं के दतुअन खातिर तुरनीं हँ।
‘सरहा? हमार सरहा तहरा घरे?’
‘आरे, माने हमार सार तहार सार ना भइलें का?’- फुलेसर कहलें।
‘हमरा कवनो सरहा- फरहा से कवनो मतलब नइखे। तू गंगा पार, हम दहवा पार। तहरा तनिको ना बुझाइल ह कि जवना बेरा आम मोंजरियाता, ओ बेरा दतुअन त दतुअन एगो पतइयो ना तूरे के चाहीं?’- भुवर बेजोड़ रीसि में कहलें।
फुलेसर का ठकया मारि दिहलसि। जिनिगीभर के संघतिया भुवर से अइसन बेहवार के आशा ना रहे। दतुअन भुवर का दुआर पर फेंकि दिहलें आ तुरते चउराहा जाके एगो ब्रश आ जीभा कीनि ले अइलें। सरहा दतुअन क लिहलें। भुवर ओ ब्रश आ जीभा के प्लास्टिक में लपेटके पलानी में खोंसि दिहलें। अब कबो केहू हीत- नात आवे त उहे ब्रश आ जीभा नया किनल कहिके दतुअन का बदले दे देसु।
एकदिन फुलेसर के दूसर सार आ गइलें। दतुअन का बेरा फुलेसर उहे ब्रश आ जीभा दे दिहलें ई कहत कि कहाँ जाईं दतुअन तूरे? कल्हिए अपना खातिर कीनिके ले अइनीं। अपने एही से क लीं, हम अपना के दूसर जोगाड़ क लेनीं।
सरहा बढ़िया से दतुअन कइलें आ खाए बइठलें। लगवें फुलेसर के छोटका लइकवे बइठल रहे। खात आ अपना बहिन से बतिआवत कहलें- ‘पहुना हीत-नात के कदर के जानिले। देखु ना, अपना खातिर ब्रश आ जीभा ले आइल रहनीं हँ आ ओ से हमराके दतुअन करा दिहनीं हँ। हमार त काम कवनो दतुअन से चलि गइल रहित। अब उहाँ का दोसर कीने परी।’
सुनते फुलेसर के लरिकवा कहलसि- ‘बै, ऊ त हरदम पलनियाँ में खोंसल रहेला। केहू हीत-नात आवेला त दतुअन का बदले उहे दिआ जाला। बाबू कहेलें कि के जाउ दतुअन तूरे?’
सुनते सरहा के सगरे देह गिनगिना गइल। सामने के खएका जहर जइसन लागे लागल। ना छोड़ल बने, ना घोंटल। केतना अदिमी का मुँह में ई ब्रश- जीभा गइल होई, सोचते ओकाई आवे लागल। खएका छोड़िके झटकाहे उठलें आ दुअरा आवत- आवत पेटके सब खाइल-पियल बहरी आइए गइल। थोरे देर बाद अथिर भइलें आ फुलेसर के जवन ना कहे के तवन कहत किरिया खइलें कि आजु से बहिनउरा छुटले ह।
फुलेसर लाजे धरती में गड़ि गइलें। कबो लरिकवा का ओर गुरनाके ताकसु त कबो अपनी गलती पर पछतासु। छोट सार के हाथ जोरलें, लेकिन सरहा नाहिंए मनलें, खखारत- थुकत आ फुलेसर के रिसिआइल आँखिसे देखत चलि गइलें।
त भाईसब! दतुवन जरूर करीं आ कराईं, लेकिन फुलेसर जइसन ना।
✍संगीत सुभाष,
मुसहरी, गोपालगंज।

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