दोहा – व्यंग परिहास

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दोहा व्यंग परिहास

बीबी से गर ठेक बा,तजीं तर्क तकरार।
धोती कुरता झारि के,चलि जाईं बाजार।।
बाली झुमका आन दीं,ले आईं सलवार।
जल्दी आईं साँझि के, धो दीं गेह दुआर।।
जानू धनि मैडम कहीं,बोलीं जै जैकार।
हाथ जोरि बंदन करीं,माफी दीं सरकार।।
होखे अगर दिमाग में,रउआ जादा खौफ।
फेकीं सेलोफोन के,करी स्वीच के ऑफ।।

कोइर के देवता बनीं,मत बनीं होसियार।
दीन हीन भरतार के इहे कुसल ब्यवहार।।
कीचन बर्तन सभ करीं,बनि मत ढेर अधीर।
भाग कर्म के दोष दीं,पोछीं नयनन नीर।।
अबहुँ बात गर ना बने,समझीं बा कछु शेष।
बतिया उनुकर मानलीं,ना त तजि दीहि देस।।

उनुकर चाहत जानि लीं, सुनीं अर्ज आदेश।
देह नेह हरदम करीं,जिनि रहीं पेशोपेश।।
खान पान पर ध्यान दीं मानल करीं बिशेष।
हाथ गोड़ मालिस करीं,रंगी उनुकर केश।।
टहल टिकोरा सभ करीं,बनि जाईं बनिहार।
बकबक गर जादा करबि सुनबि डाँट फटकार।।
येनो ओनो छोड़ दी,ना त होइहें मार।
हाथ में उठी बेलना, मिलिहें न धरनिहार।।

बीबीजी के सामने,अइसन हाल हमार।।
जइसे केहरि सामने,काँपे स्वान सियार।।

अमरेन्द्र कुमार सिंह,
आरा, भोजपुर, बिहार।