नखरा

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डाल गलबाँह झुमे भीत प भदकड़ी।
हक्क-बक्क बन निसबद बाड़ी मकड़ी।
पाँखिल पिपरी के, बाग ना अड़ाला,
जोम-जाम-आँधर न लखे उँच-खाला।
बिजुली के रोशनी प लुबुध फतिंगना।
बिसतुइया ता-थैया नाचलि अँगना।

थरिया पितरिया में तुरुस परोसली।
पियवा अवन के अगतहीं भकोसली।
हूल शूल जिया जरे बयद बुलाईं।
टुटही खटियवा प झूला न झुलाईं।
हरका से उजबुज होखे भरबितना।
नीक करवट अधलेटे पट चित्तना।

तीसिया के तेल पिय लट लटिआवे।
कहाँ केहू कबले अखिर मटिआवे।
तेलवा-फुलेल मोरे मनवाँ के तिसना।
सहल न जाय अब टँगरी के टीसना।
हरदी के झाँस नहिं दरदी निवारे।
पाँव टीपे कहीं नहिं सरम तिहारे ।

दिनेश पाण्डेय,
पटना।

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