बसंत

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#बसंत

किसिम किसिम के फूल खिलल बा,
बाग बगइचा महकत बा।
का बसंत के बात करीं हम?
गतर गात जब लहकत बा।

ढ़ाक खिलल बा लाल बाग में,
सरसो पीयर क्यारी में।
फैल गइल बा रंग बसंती,
सँवसे खेत बधारी में।
रंग भरल पर रंगत नइखे,
ऊसर उर में नफरत बा।
का बसंत के बात करीं हम?
गतर गात जब लहकत बा।।

झाड़ गाँछि में टूसी फेंके,
महुआ अब कोचियाइल बा।
नया गात बा नया पात बा,
आम डाढ़ि मोजराइल बा।
भाव मरल बा मन मंदर के,
बीज घृणा के अंकुरत बा।
का बसंत के बात करीं हम?
गतर गात जब लहकत बा।।

पी पी पी पी करे पपीहरा,
पीपर बर पगलाइल बा।
कोइलर के कुहुकार सुनि के,
सागन तरु अगराइल बा।
मन बीणा के तार टूटल बा,
प्रेम राग ना उमगत बा।
का बसंत के बात करीं हम?
गतर गात जब लहकत बा।।

अमरेन्द्र कुमार सिंह
आरा भोजपुर बिहार

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