बासंती दोहा

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पिया हूक हिय में उठे , देह न माने बात ।
तिय सतवंती गाँव के, झेले सइ-सइ घात ।।

तोहरे खातिर ए धनी, काम करीं दिन रात ।
रितु बसंत पूछी कबो,  कहिहऽ दिल के बात ।।

दूर देश साजन बसे, तिय रहनी ससुरार।
सास-ससुर सउदा-सुलुफ, गरू गोठ गरुआर ।।

महुआ कुचिआइल भले,  मोजर चढ़ल खुमार ।
अमराई तनहा लगे,  मन में उठे गुबार ।।

ए मन तनिका चेत जा , आइल बा मधुमास ।
सिहरावन सन-सन चली, बैरिनिया के साँस ।।

रहब ब्यस्त आठो पहर,  तन के बढ़ी न ताप ।
मन से रउरे नाम के, करत रहब हम जाप ।।

कोइल कागा कान में,  कहे बात कुछ कंत ।
मन के बन्हली खूँट से, उफ्फर परस बसंत ।।

~ कन्हैया प्रसाद रसिक ~