बिदेसी

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‘हलो, भुवर बोलतारें?’
‘हँ, ए फुलेसर भाई! हम भुवर बोलतानीं, सैखोवाघाट, आसाम से। कहS, का हालचाल बा? कइसे मन परलS ह?’
‘बाबू! बखार भर बधाई तहरा के।’
‘ऊ काहे खातिर ए फुलेसर भाई!’
‘बाबू, तहार भाई बिदेसी हो गइलें। तू तS नाहिंए बतवलS ह बाकी तू ना बतलइब त हम जनबे ना करबि का? अखबार में लोग पढ़त रहल ह त हमहूँ सुनि लिहनीं हँ। तहार भाई बिदेसी भइल बाड़ें। खरचा का डरे जनि डेरा। भेंट होई त हमहीं मिठाई खिया देबि।’
‘बै मरदे, हमार भाई त गाँवें बाड़ें। का करे बिदेस जइहें आ बिदेसी होइहें?’
‘त हम कहाँ कहतानीं कि ऊ दूसरा जगह गइल बाड़ें? ऊ घरहीं बिदेसी भइल बाड़ें।’
‘माने इहो कवनो बात भइल कि घरहीं रहि के बिदेसी हो जा। केहू तहसे मजाक कइले होई।’
‘मजाक त तू करतारS। लोग कहता आ अखबार छापि दिहलसि। सब झूठे ह का?’
‘केहू बिदेस जाला त ओकर अखबार में नाम छपाला का?’
‘देखS भुवर हमके निपढ़ जानि के बात के जेंवर लेखा अँइठS जनि। अखबार में त एतना ले लिखल रहल ह कि फलाना, फलाना के हेतना वोट से हरा के फलाना पंचाइत के बिदेसी भइलें।’न
‘आरे फुलेसर भाई! वोट आ हारजीत के बात कइलS त अब समुझ में आइल। हमार भाई बीडीसी (ब्लाक डेवलपमेंट कमिटी) के सदस्य नु भइल बाड़ें हो। बीडीसी के चुनाव लड़ल रहले हँ, जीतल बाड़ें।’
‘उहे त हमहूँ कहतानीं कि बिदेसी भइल बाड़ें। जनता खातिर नेता लो बिदेसिए बा, जब पँचवे बरिस दरसन होखे के बा त।’

संगीत सुभाष

✍संगीत सुभाष,
मुसहरी, गोपालगंज।

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