बिरछ के पात से झर कुछ किरिन नीचे डगर आइल।

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भोजपुरी गजल

बिरछ के पात से झर कुछ किरिन नीचे डगर आइल।
कपोलन पर गरम छूअन, लुनाई हद बगर आइल।

घुमा गरदन-सुराही धूप के परिहार के बहने,
समुझ कहवाँ पड़ल आतुर अधर अधरन कगर आइल।

न पूछऽ साँस के बावत मचल हँड़होर कतिना ना,
हवा हऽ बौरही आखिर, अनासे लड़ झगर आइल।

बलिस्ता बाँह के होखल, कवन अपवर्ग सुख अइसन?
लड़ल जब आँख बालम से, सरम बहुते, मगर आइल।

न चूड़ी के खनक भइलसि, न छागल ही बजल रुनझुन,
मदीली गंध मोजर के पसर सगरी नगर आइल।

खुमारी से जिया अहदी, रहे दीं बात मौसम के,
फगुन में का करीं जबरी केहू कुंकुम रगर आइल।

श्री दिनेश पाण्डेय,
पटना।

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