भोजपुरी सबद संपद – भाग-५

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तातल- [सं- तप्त-ल] गरम।
पाँजर- [सं- पञ्जर] पार्श्व, बगल।
फोरन- [सं- स्फोटन] बघार।
सोहाग- [सं- सौभाग्य] सुहाग, आनंद,
कुसलाई, ऐश्वर्य।
बिहान- [सं- विभान] सुबह।
कहनी- [सं- कथनिका] कहानी।
बहिर- [सं- बधिर] बहरा। आन्हर गुरू बहिर
चेला, माँगे गुर त देवे धेल।
भसुर- [सं- भातृ श्वसुर] पति के बड़ भाई।
राउर- [सं- राजकुल] आपका, श्रीमान का,
अंत:पुर।
पिचास- [सं- पिशाच] कच्चा माँस, रकत
खाएवाला मानुस भा आन जीव।
भूत, परेत काल्पनिक परानी बदे
रूढ़। पिशुन, पिस्सू एकरे मूल ‘पिश्’
से व्युत्पन्न।
इनार- [सं- इन्द्रागार] कुआँ।
कायर/कादर- [सं- कातर] डराभुक, डरपोक।
बछरू- [सं- वत्सरूप] गाय के बच्चा।
इरिखा- [सं- ईर्ष्या] द्वेष।
गधबेरा- [सं- गोधूलि बेला] साँझ।
गिरह- [सं- ग्रंथि] गाँठ।
गँठ बन्हन- [सं- ग्रंथि बन्धन] गठजोरी।
गिरहथ- [सं- गृहस्थ] खेतीबाड़ी करे वाला।
गेंड़ुरी- [सं- कुंडली] साँप के वृत्ताकार बइठल।
गोइँठा- [सं- गोविष्टा] कंडा, उपला, चिपरी।

✍दिनेश पाण्डेय, पटना, बिहार

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