रहबि कतने देर तक अब लास बनि कै

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आदमी-
बनचर बनल बा
बेचि के सम्मान के
जालि अरु जलखर भइल बा
भूलि निज पहचान के।
चित्त में न चेत बा नीन बा न चैन बा
जीव इहँवा जी रहल उसाँस बनि के।।

हृदय में
हलचल मचल बा
दंभ इरिखा साथ बा
पाप से मृति डर बनल बा
मैल मंथन गात बा
भय बा न लाज बा मन दसानन राज बा
उजास बिनु जी जी रहलि हतास बनि के।।

ज्ञान में
गरहन लगल बा
भूसा भरल बा माथ में
लोल में
मिसरी घुलल बा
तेज छूरी हाथ में
हित नाता मरि गइल,प्रीति बा न रीति बा
प्यार बिनु जन जी रहल बदहास बनि के।।

राग में
रजरस भरल बा
भाव बा ना भक्ति बा
भाग में
अपजस भरल बा
काम से आसक्ति बा
तार तंतु झर गइल,ना गीत ना संगीत बा
संज्ञान बिनु सुर जी रहल उदास बनि के।।

✍अमरेन्द्र सिंह, आरा

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