रेंड़ी के तेल

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मन के अँतरे कोने में दबल लालसा कइसन-कइसन गुल खिलावेला? एह बात के अहसास तेकरे होई जे एह मरज के मरीज रहल होखे।
सिधारी मिसिर आ चनरधारी मिसिर एक पीठिए भाई रहल लोग। बाबूजी पुरोहिताई पेशा प जिनिगी के जाँगर खेप लिहनीं। इचि भ बिसुनचुटकी, अगऊँ भा सवा टका दछिना के बल प घर के गाड़ी लस्टम-पस्टम चल जरूर गइल बाकि एह बरकत में अतना गुंजाइश ना रहे जे चदरी से बहरी टांग पसारल जाय। मिसिर बंधु के पढ़ाई लिखाई ‘ओनामासी धम’ से शुरू भइल आ ‘रामऽ गति, देहू सुमति प समापत। हँ, एह दरमियान ‘सरब मंगल मांग ले, शिवे स्वार्थ साधिके’ मंत्र से उपजल पुश्तैनी पेशागत सहजाचार के गुन गिरोह के अतिना लब्धि त भइए गइल कि ‘जे न बंधो बलिराजा दानवेन्द्रो महाबल:’ के जसगान करत उदार जजमान के कान प जई के दुइगो पउध राखि के किरपा दृष्टि प्राप्त क लिहल जाय।
अड़चन कहाँ नइखे? त हेहू धंधा में कम दिकदारी ना रहे। गाँवा-गाँईं, रने-बने माँकल चलीं। छठी-बरही, मुअनी-जिअनी, तीज-तिहार, नेत-बँउरहत हर बखत खोजी-पेठौनी। बूझीं कि गोड़ में चकरी लागले रहे बाकिर एसे ओतिने आमदरफ्त होखे कि ले देके छुधा तृप्ति के जोगाड़ हो जाय। एक दिन हेही भागा भागी में सिधारी मिसिर के गोड़ में कतो ठेस लाग गइल आ ठेसाहुर गोड़ के सुभाव त जानले चीझ ह, जतने बचाईं अदबद के हुँहईं टुनुक जाई। सर्वौषधि के ताकत फीका परि गइल। का ना उपाय भइल? नीम के टूसा थूर के थोपाइल, दही छोप के कुक्कुर से चटावल गइल, कुकुरौंधा के लेपन भइल, ऐन घाव प लरिकन से सुसुम शिवांबु के तुर्री मरवावल गइल बाकी कवनों असर ना। असर परे त कइसे? तनिके गफलत से अँगूठा फेरु टकरा जाय आ घाव खुनसा जाय।
ओही काले ई टिसुना मिसिर बंधु के मन में जागल रहे, चाहीं त एकरा के ‘जूता के जुनून’ कहि लींजा। मन में आइल जे मजिगर जूता पाले रहित त ई दिन देखे ना परित। हजारी बाबा के कहनाम कि दिढ़ संकल्प से दुबिधा के बेड़ी कट जाला। मिसिर बंधु ठान लिहले त ठान लिहले। दान-दच्छिना के दशमांश जूता भाग के हाँड़ी में धरा जाय। मन कसरिआह होखे के बहाने जब तब उपास पर जाय आ अनुष्ठान के पुरनाहुत प ततिना अन्न हँड़िया के हवाले। ऐ तरे ओइसनों दिन आइल जब हेह ‘जूतेष्टी तप’ के फल परापत भइल आ दुनो भाई बदे दू जोड़ी चमरुआ उपानह के पदार्पण घर में भइल। अबले जिनिगी में अइसन खुशी कबो ना भेंटल रहे। जइसन कि अक्सर होला ऐन खुशिए के मौके अइसन बिघिन सामने आ जाई कि एक बेरि बुझाई जे भगवान जी छछाते धीरिज के थाह ले रहल बानीं।
चमरुआ जूता के चरम आनंद पावे के एगो अनिवार शर्त ह कि ओकरा के रेंड़ी के तेल में चभोर के मोलायम क लिआव। आहि दादा, अब रेंड़ी के तेल के खरच कहाँ से जुटावल जाय? सारा उछाह फीका भ गइल, जूता के उपलब्धि से पैदा गरब तावा प रखल गरम नौसादर अस छूमंतर भ गइल। दुनों भाई के भर राति नीके तरे नीनि ना आइल। कबो हेह करवट, कबो होह करवट। भुरुकवा उग गइल रहे आ कहईं चुचुही बोलत रहे कि चनरधारी मिसिर के दिमाग में भक्क से इँजोर भ गइल। ऊ बगल के बँसखट प कसमसात सिधारी मिसिर से फुसफुसइले – “भइया, अब सूति जा। हमरा उपाय सूझि गइल।”
दोसरा दिने दुनो भाई जौंखी साव के दोकान प किराना सामान कीने के नीयत से जा के ठाढ़ भ गइले। मोल-भाव का मधे सिधारी मिसिर के नजर अगवासा रखल रेंड़ी तेल के कनहतर प बेरि-बेरि जाय त चेहरा प आश्वस्ति के भाव अउ गाढ़ हो जाय। एही बीचे दुनो जन में कवनों बात के लेके बकझक शुरू भ गइल। आन लोगन बदे ई अजूबा घटना रहे काहे कि झगड़ा के के कहो, कबो इन्ह लोगन में परस्पर तरखा-तरखी के बातो ना सुनल गइल रहे। आज त हद्दे भ गइल। कतिना दिन के दबल बिखाद एके बे निकलल त ममिला ढेर बिगर गइल। जले जौंखी साव बीच बचाव के कोशिश कइले कि चनरधारी मिसिर के जूता चल गइल। ऊ त ऐन बखत प सिधारी मिसिर थोरे कगरिया गइले आ जूता सीधे जाके रेंड़ी तेल के टीन में डभक गइल ना त उनकर जबरी टूटि जाइत। सिधारी के गुस्सा आसमान में, ऊ रगेदले, चनरधारी भगले। जौंखी आपन कपार पीटे लगले तले दन् से सिधारी मिसिर के फेंकल जूता ओही रेंड़ी तेल के कनहतर में, डुभुक।
चनरधारी त नापता रहन बाकी सिधारी मिसिर दुनो जूता से तेल चुआवत पाछू से चलल जात रहन। उनकर चेहरा देखे से ना लागत रहे कि कवनो बड़का कुकांड भ गइल बा।

✍दिनेश पाण्डेय,
पटना।

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