#लाठा_पंडित#

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गाँव के नाँव निपढ़वा. पुरहर आबादीवाला गाँव में एक घर पंडी जी के. गाँव का नाँवे का हिसाब से बारी के बारी चउरिए रहे, माने सभे निपढ़. पंडियो जी जेहे- सेहे पढ़ले रहनीं. बाकी, गाँव भर में एगो पंडी जी रहनीं त केहू का कवनो दिन- साइत जाने के होखे त उहें से आके पूछे. फेड़ ना खूँट, तहाँ रेंड़ परधान रहनीं. अब पंडी जी का लगे कवनो पोथी- पतरा त रहे ना जे ओसे कवनो मुहूरत देखीं. लेकिन, एगो उपाइ निकाल ले ले रहनीं. ऊ का कि कोन्हियवा घर में पनर$ गो लाठी ध देले रहनीं. ओही लाठी से रोज बिहाने एगो लाठी निकाल के दोसरा कोना में ध दीं. केहू पूछे कि ए पंडी जी, आज कवन तिथि ह त पंडी जी भीतर जाके कोनवाली लाठी गनिके बता दीं कि आज नमी ह कि एकादसी. एहीसे उहाँके नाँव लाठा पंडी जी परल रहे.
अब भइल का कि एकदिन मलिकाइन घर लीपे गइली. घर लिपत- लिपत सगरी लठिया एके में मिला दिहली. तले एक जना जजमान आ गइलें आ पूछलें कि आज कवन तिथी हवे, ए पंडी जी?
पंडी जी कहनीं-‘ तनी रूक$, बतावतानीं.’ पंडी जी भीतर गइनीं त सगरी हुँसियारी भुला गइल. सब लाठी एके जगहि धइल रहे. अब पंडी जी करीं त का करीं? मलिकाइन से पूछनीं-‘ ई का क देहलू? अब जजमान तिथी पूछता त का बताईं?’
मलिकाइनो का अपनी गलती पर बड़ा लाज लागल.
पंडी जी पूछनीं- ‘ आछा ई बताव$ कि क- क गो लाठी कवना कोना में रहल ह?’
मलिकाइन कहली- ‘अब हम निमन से गनि त ना पवनीं हँ, बाकी लागता कि चार गो लाठी हे कोने आ एगार$ गो लाठी हो कोने रहल ह.’
अब पंडी जी का कुछ तिहा परल. बहरा आके जजमान से कहनीं कि ए बाबू आज गबड़सउनी चउथि ह.
जजमान- ‘ई कवन चउथि ह, ए पंडी जी? ई त हम अपनी जिनिगी में कहियो ना सुनले रहनीं हँ.’
पंडी जी कहनीं कि तहार बापो ना सुनले होइहें. बड़ा भागि उदय होला त चार- पाँच स बरिस बाद सताइस नछत्र एकाठा भइला पर ई चउथि आवेला. कई पुस्त ए परब खातिर तरसत रहि जाला. तहनलोग आ हमहूँ भगिमान बानीं जा कि हमनीं कि जिनिगी में ई चउथि आइल बा.
जजमान पूछलें कि तब हमनीं का का करे के चाहीं?
पंडी जी कहनीं-‘ करे के त बहुत कुछ चाहीं लेकिन एतना जल्दी का हो पाई? एसे, जेकरा पार लागे जाके नदी नहाउ आ जवन हो सके दान- उपदान करे.’
ई बात गाँव में पेटरउल का तरे फइल गइल. गाँव भरके मरद, मेहरारू, लइका, सेयान, बूढ़, जवान नदी में नहाए चलि देहलें. जेकरा जवने सीधा- पिसान, रूपिया- पइसा जुटल, नहा- नहाके पंडी जी के दान देबे लागल. पंडी जी का भरपूरे लहे लागल.
तले एकजना जवान पंडी जी कासी से पढ़िके घरे लवटल रहनीं. पोथी के बोरा घोड़ा पर लदले ओही राहता से जात, एतना लोग के नदी नहात देखनीं त चिहाके एकजना से पूछि देहनीं कि आज का ह ए भाई कि एतना लोग एक साथे नदी में नहाता?
ऊ कहलें कि तुहूँ त पंडिते बुझातार$ आ एतनो नइख जानत कि आजु गबड़सउनी चऊथि ह.
‘ई कवन चउथि ह हो? करवाचउथि, गनेसचउथि, बहुत चउथि हम जानतानीं, बाकी ई चउथि त पहिले दिन सुनतानीं.’
ऊ आदमी कहलें कि अबे नाया बाड़$. तू का जनब$? ई चउथि रोज- रोज ना नू आवेला. चारि- पाँच स बरिस पर आवेला. इहे चउथि साढ़े चारि स बरिस पर आइल बा.
पंडी जी कहनीं कि आरे ए बाबू, तहन लोग के पंडी जी कमाए खातिर तहन लोग के मूरूख बनावतानीं. अइसन कवनो चउथि ना होला. होत रहित त सास्त्र में लिखल रहित. हम सब सास्त्र पढ़िके कासी से लवटल बानीं. हई देख$ सब सास्त्र के पुस्तक हे घोड़ा पर लादल बा.
बतकही सुनिके अउरी लोग लगे आ गइल. सभे कासीवाला पंडी जी के झूठ कहे लागल. एकजना तनी- मनी हुँसियार रहलें त कहलें कि आछा ढेर जानतार$ त हमनीं का पंडी जी से सास्त्रारथ क ल$. दूध के दूध आ पानी के पानी हो जा.
कासीवाला पंडी जी तेयार हो गइनीं. नदी किनारे, आम का पेड़ तर जल्दी- जल्दी चउकी धरा गइल. चादरा बिछि गइल. कासीवाला पंडी जी आके बइठि गइनीं. तले गाँववाला पंडी जी अइनीं. कासीवाला पंडी जी ई सोचिके कि सास्त्रारथ त होते रही, इहाँ का उमिर में बड़ बानीं त परनामा-पाती क लीं. उहाँ का ना जानि पवनीं कि लबेद का जगही बेद के कवनो काम नइखे. उठिके हाथ जोरि के कहनीं-‘नमसकार.’
गाँववाला पंडी जी सुनते बोलनीं- ‘ नमसकार, फमसकार, ठमसकार. पहिले ई बताव$……
एतने पर निपढ़वा गाँव के लोग लागल ताली बजावे. हाला मचि गइल कि हमनीं के पंडी जी जीति गइनीं. ऊ पंडित एक बेर बोललें हँ, तले हमनीं के पंडी जी तीनि बेर हनि देनीं हँ. आरे, एकरा कुछु नइखे आवत. छिनि ल सन, ई पोथी – पतरा. कहला के देरी रहे. कासीवाला पंडी जी के हाल भँइसि का आगे बीन बजावेवाला हो गइल. केतनो समुझावे के कोसिस कइनीं, केहू ना सुनल. पोथी छिना गइल. मन मारिके घरे चलि देहनीं.
घरे चहुँपला पर बड़का भाई पूछनीं हालिचालि त पंडी जी निपढ़वा गाँव में भइल बेइजती आ पोथी छिनइला के सब कहानी कहनीं. भाई कहलें कि तू धीरा रह$, दू- चारि दिन में हम दवाई क देतानीं.
चारि दिन बाद निपढ़वा गाँव में एक जना पंडी जी ओही तरे घोड़ा पर नरिया- थपुआ लदले( पोथी का बदले) चहुँपलें. एक अदिमी के नजर गइल त कहलें कि अबे गबड़सउनी चउथिए के एगो पंडी जी के पोथी- पतरा छिनाइल ह, अब तू आ गइल? भागि जा जल्दी ए गाँव से.
पंडी जी कहनीं कि हमार पोथी के छीनी रे? केतना जनाके हम छिनले बानीं. कहाँ बाड़ें पंडी जी, तनी बोलाव$ लो त.
एक बेरि फेरु हाला मचल. ओही जगह सास्त्रारथ सुरू भइल. दुनू पंडी जी कहे सब पहिले तू पूछ$ त पहिले तू पूछ$. अन्त में गाँववाला पंडी जी पूछनी- ‘ ख ख खइया.’
अब ई पंडी जी जानिबुझि के पहिले ना पूछत रहलें कि पूछनीं आ कहीं पंडी जी कुछुओ कहिहें त ताली बाजि जाई आ हमरो ओहीं तर लवटे के परी.
अब इनका मोका मिलल. कहलें-‘ पहिलहीं ख ख खइया? आरे, जोता- जोतइया, कोड़ा- कोड़इया, बोआ- बोअइया, पाटा- पटइया, काटा- कटइया, दावाँ- दँवइया, पिसा- पिसइया, साना- सनइया, पाका- पकइया तब नू ख ख खइया कि पहिलहीं?
बाजल ताली. सब जजमान कहलें कि एतना भारी पंडी जी हमनीं का ना देखले रहनी हँ जा. बाप रे बाप! एकबेर ई पंडित बोललें हँ त ई नवका पंडी जी बोलते रहि गइलें हँ. पंडित एके कहल जाला. सभे निहोरा कइल कि हमनीं के उपरोहिती करीं. बाकी पंडी जी कहनीं कि हमरा कवनो लालच नइखे. जेकर पोथी छिनाइल रहे, ऊ हमार भाई हउअन. हमसे सब बतवलें. हम खाली पंडी जी के पखंड खतम करे खातिर सब कइनीं हँ. अइसहीं हमनीं का बदनाम बानीं, उपर से अइसन काम होई त बदनामीअउरी बढ़ि जाई. एसे केहू पंडित होखे, कवनो जजमान के अपना लाभ खातिर मुरूख मति बनावे.

#संगीत_सुभाष

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