वोटर (लघुकथा)

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नेता जी भर गर गेना का फूल के माला पहिनले, दुनू हाथ जोरले, मन्द- मन्द मुसुकात आगे- आगे चलत रहनीं। पीछे से कानफारू सुर में नारा लागत रहे। हमारा नेता कइसा हो…? पीछे बोलेवाला लोग नेता जी के नाम ध के…….जइसा हो। आगे नारा बोलेवाला बोले का बेरा आपन दहिना हाथ असमान का ओर उठा के एगो अंगुरी ऊपर करे त लागे कि असमान में छेद क दी। बोलला आ हाथ ऊपर उठवला में गजब के तालमेल रहे। ओकरा हावभाव आ अन्दाज से ओ पूरा भीड़ में नेता जी के ओ से बड़हन समर्थक केहू ना लागे।

दुसरा दिने दुसरा नेता के काफिला अइसहीं आइल। ओहू काफिला में वइसहीं नारा आ वइसहीं लोग। बदलल रहे त बस नेता जी के चेहरा। हद त तब हो गइल जब भीड़ में नारा बोलेवाला उहे अदिमी लउकल।

साँझि बेरा संजोगन फुलेसर से ऊ अदिमी भेंटा गइल। फुलेसर पूछि दिहलें- ‘का हो! काल्ह दुसरा पाटी में चिल्ला चिल्ला के नारा लागत रहे आ आजु दुसरा पाटी में? एकर माने? दल बदलि दिहलS का?’

‘बै मरदे! हमरा दल वल से का लेबे- देबे के बा? हमरा के त जेही एक हजार दी, ओकरे नारा लगाइबि। ढेर बुद्धि खपवला के गरज नइखे। सीजन आइल बा, कुछ जोगड़िया लेत बानीं। बाद में ए में से कवनो एगो चाहो ना पिआई।’

फुलेसर का सब माजरा समझ में आ गइल। पुछलें कि तब इहो बता दS, वोट कहाँ दिआई?’

‘वोट? वोट देबे के त पहिलहीं से मन बना लिहले बानीं। बोंका छाप जिन्दाबाद।’

✍️संगीत सुभाष,
प्रधान सम्पादक, सिरिजन, भोजपुरी पत्रिका।

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