सुपातर के खोज

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भुसुक गइल बा भरम के भउरा, सत के मारग धइला से।
लोभ लँगोटी ले के भागल , संतोषी मन भइला से ।।
समय सारथी सत मारग पर , सभके कदम बढ़ावेला ।
जे ना समझे चाल समय के , ऊ पाछे पछतावेला ।।
ताल ठोक के कहे लडइता, हमरे बल डंका बाजी ।
हँसके समय कहे सुन बबुआ, टिसुना तोर न बा राजी ।।
लोकतंत्र में जनता मालिक , बनल बिया असहाय प्रभो ।
अपने मत के सउदा करके, करे जाप शंभो शंभो ।।
देखऽ भइया बहिनी बबुआ , के समाज से बागी बा ।
राजतिलक करिहऽ उनहीं के , जे ना कवनो दागी बा ।।


✍️कन्हैया प्रसाद रसिक

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