ई का भइल बा

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चोट नईखे  लागल  थुरा गईल बा,
पानी अछईत ओठ झुरा गईल बा।

फेंड़ ढे़र झंखाड़ लागल बा एहीजा,
बाकी का कहीं छांह ओरा गईल बा।

सोझा  त  सभकुछ  रहताय हमरा,
आंखि जाने काहे आन्हरा गईल बा।

ईयाद त  हरदम  रहेला  आहट के,
बाकी लिखल पाठ भुला गईल बा।

मन के कपडा़ चपोत के राखिला,
केहु बतावे काहे मचोरा गईल बा।

देखे में कुछो लपेटाईल नईखे लउकत,
पता ना फेरु काहे अझुरा गईल बा।

धईले  बानी हीरा  मोती  गेंठरी में ,
फेरुओ लागता कुछ हेरा गईल बा।

हमर त कुल्हि हमरा भीरीए बा राय,
बाकी  लागता  केहु  परा  गईल बा।

देवेन्द्र कुमार राय
(ग्राम +पो०-जमुआँव,पीरो,भोजपुर,बिहार  )

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