जै बसंत

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#जै बसंत

दिग दिगंत में ऋतु बसंत में महकेले फुलवारी।
अंग अंग रगि गइल अवनि के लागे अति मनहारी।

अरुष रंग कचनार फुलाइल सुर्ख रंग रतनारी।
नव दुल्हन के मृदुल गात में पीत रंग के सारी।

रंग बिरंगी फूल कसीदा नीला रंग किनारी।
महुआ गाछी कोचा लागल मोजर सौरभ डारी।

डार डार प कोइलर गावे मीठ प्रीत कुहुकारी।
चातक बोले पिऊ पिऊ,पी पी बोले नारी।

गात गात जूही लदराइल गदर गइल गुलनारी।
चहके बहके मोर मोरनी सुग्गा सुग्गी सारी।

कुसुम कली पर भँवरा घूमे संग संग भृंगनारी।
पुष्पधूलि चूवत पुमंग से महके बाग कियारी।

गली गली में राग फाग के हाथ हाथ पिचुकारी।
ढोल चंग मिरिदंग बजेला तुरही बाजे न्यारी।

ब्रजमंडल में ग्वाल बाल अरु नाच रहे बनवारी।
रंग डारि हुड़दंग करेली बरसानी ब्रजनारी।

रमा रंग में होरी खेले कान्हा मदन मुरारी।
श्याम रंग में रंगल रहे बृषभानुसुता की सारी।

गावै गोरी रंग उमंग में ग्वाल बजावै तारी।
सुर नर मुनि जैकारी बोले जै जै रासबिहारी।

सरजू तट साकेतलोक में होरी की तइयारी।
रामचन्द्र के संग खेलेली जननी जनकदुलारी।

होरी खेले देवलोक में सुरजन अरु सुरनारी।
नारदजी करताल बजावै हरखे सची सुरारी।

शिवलोके में नंदी सृंगी भूत दूत फनकारी।
भंग चढ़ा के रंग लगावै गिरिजा के त्रिपुरारी।

ब्रह्मलोक में होरी खेलैं विद्या संग खरारी।
साधु संत के संग संग आनंद करे ब्रह्मचारी।

रतिपति पूत बसंत ऋतु में काम भाव संसारी
सजनी देखे बाट सजनके चढ़िके ऊँच अटारी

हास रास मधुमास भरेला हरसेला घरवारी।
झूमि झूमि के रंग करेलनि बाल वृद्ध नरनारी।

सकल चराचर हर्ष मनावे लागेला सुखकारी।
मधु मंगल वैदिक पवनी हो सभके मंगलकारी।

अमरेन्द्र कुमार सिंह,
आरा, भोजपुर, बिहार।