लरिकाईं के जिद्द

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छरियाइल बा नन्हका चाहीं  खेले खातिर टुइयाँ।
रो रो के हलकान भइल बा  माथा पीटे भुइ़ँयाँ ।

टुइयाँ पा के खुसी भइल कुछ  इतरइले सन  साथी।
अगिला दिन फिर छरियाइल ऊ चाहीं एगो हाथी।

हाथ खिलौना हाथी पवते  दसगुन मन बढ़ियाइल।
बबुआ रहलन जिद्दीपन में बतिया कहाँ बुझाइल।

रामखेलावन टॉफी देके  उल्टी मति भर  दिहलन।
टुइयाँ में हाथी घुसियाई  मिली छोहाड़ा कहलन।

अगिले छन छरिअइले फिर से  रखलन मांग अनोखा।
टुइए़ँ ना गजराज घुसइबऽ  मूअब फान झरोखा।

माई-बाबू टोल-परोसा  लाख-लाख समुझौले।
टुइयाँ में हाथी के खाली  रो-रो रटन लगौले।

नवका कपड़ा नया खिलौना  नए सिलेट दिआइल।
बबुआ के कुछ मन ना भावे  याद छुहारा आइल।

बँसवारी के बसरोपन  के  भूत मगज बा धइले।
ऊहे एकरा माथे चढ़ के   नौटंकी बा कइले।

तरकुल के पतई के डंठल  छीलछाल के लावऽ।
बोर्सी के दहकत आगी में  सँड़सी एक धिपावऽ।

तरकुल के चेपा जब  सटसट लगल डाँड पऽ बाजे।
टुइयाँ फोर-फार अँगनइए  बबुआ लागल नाचे

हाथी सूँढ़ हिलाके पूछे  मालिक हम का करीं
तबले सँड़सी डाँक लगावे  बबुआ के इचि धरीं।

आफत आइल तन तऽ बबुआ  पुक्का फार चिलइले।
गइल छोहाड़ा मन से बहरी  भुइँयाँ नजर मिलइले

गरदन धऽ के बाबूजी जब रसिक के लगलन टाने ।
आई हो दादा अब ना मांगब अकिल आइल ठिकाने ।

कन्हैया प्रसाद रसिक