लुर लुफुत बाई, कबो ना जाई

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देखीं सभे जइसे रामायण में कहल गइल बा ,”वृथा ना जाइ देव ऋषि बानी,” ओसहीं हमनीं के पुरनियन के कहल कहाउत कबो बाँव ना जाय।
भगवानजी एह धरती प किसिम- किसिम के जनावर बना के भेजले बारन। ओमें एगो जनावर ह गदहा।ओकरा प कय गो कहाउत बा, “ना धोबिया के दोसर जनावर आ ना गदहवा के दोसर मउआर “। बेचारा गदहा कहाँ जाई? बड़ा देहधरु जनावर ह। जेकर देह एक बेरा ध लिही त फेर ओकर देह ना छोड़े। थोड़े देर खातिर ओकर मुँधी छटकाइयो देब त घुम- फिर के फेर आपन मउआर भी चल आई। ऊ दोसरा के खूँटा प रहिए ना सकल ह। केहू कतनो सानी गोतो, खरी खियाओ भा काँड़ी से घीव काहे ना पियावो, ऊ पाला पटक के अपना नाद प आइए जाई।
कुछ देर खातिर जब उजबुजा के ऊ केहू के खूँटा प चल जाला त लोग के बुझाला कि बबूर त आम भेंटा गइल। चलऽ खूब चोभा मारs। उनका ई ना बुझाय कि गदहा के साथे एगो आउर कहाउत बा , ” गदहा इयारी आ लात के सनसनाहट” साथे – साथे शुरु होला। माने इयारी के अरदोवाय लात के सहउवल प टिकल रहेला। एक दोसरा के लात सहत रहीं इयारी चलत रही। जसहीं लात सहे के सहनशक्ति टूटल कि इयारी टूटल।
अब ई पूछीं कि गदहा के जब लाता – लाती करे के रहेला त ऊ इयारी काहे करेला? ए से बन्हिया रहित कि ऊ इयारी ना करित। त भाई इयारी कइल आ लाता – लाती कइल दूनो दू बात ह। जइसे हाथी के दाँत खाए खातिर कुछो आउर आ देखावे खातिर कुछो आउर होला, ओसहीं राजनीति के जनावर के इयारी दू तरह के होला। इयारी कइल राजनीतिज्ञन के देखावटी भा बनावटी गुण ह। संतरा लेखा उपर से सभे बन्हाइल लउकेला। बाकी जसहीं ओह लोगन के महत्त्वाकांक्षा के खलचोंइया ओदारब सभे अपना असली रुप में नजर आई। जहाँ ले राजनीति में लाता -लाती के सवाल बा त ई बहरुपियवन के स्वाभाविक लुफुत ह। मुँह फुलउअल, कुरसी के घिंचा -घींची आ गारी – गलउज राजनीति में ना होई त देश भ में कुकुरमुत्ता अइसन उपजल बाइसकोप वालन के का होई, लोग चाह के दोकान प, पान के दोकान प आ आफिस में बइठ के एह लोगन के गुनगान ना करिहें त हरे कीर्तन करिहें?
एह से, जब गदहा लाता – लाती करे , घुम-फिर के अपना मउआर किहाँ चल आवे त बिहार के लोग के चिहाए के ना चाहीं। रउआ कतनो टेप बजावत रहीं, “बोल रे परेतवा बिहार कब छोड़बे”, बाकिर,”लुर , लुफुत बाई , कबो ना जाई”।


बिनोद सिंह गहरवार