पितृ पक्ष

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पितृ    पक्ष    मनावल    जाला    होला   सोलह     दिन   के ।
श्राद्ध आहार दान करे के मौका कर्ण का मिलल रहे गिन के ।।

स्वर्ग लोक  में कर्ण के जब दिहल गइल खाना।
सोना, चाँदी,  गहना  देख के  कइ  दिहले  माना।।

पूछे लगले इंद्र देव से का गलती भइल हजूर?
इंद्र देव भी कहे लगले कर्ण हम बानीं मजबूर।।

दान  पुन  तूही  कइले  बाडs  उहे  तोहके  हम दे तानीं।
बात सुनि कर्ण कर जोड़ के कहले धरती प  जातानी।।

श्रद्धा  से  जाके  श्राद्ध  करब प्रभु  तबे  हम  वापस  आइब।
इयाद करब, पूर्वजन के अपना तारब अवरू खुद तर जइब।।

श्राद्ध परब प ई कथा अधिकांश सुनावल जाला।
पितर  लो  के  तर्पण  के  बारे  में   बतावल   जाला।।

सीता माता ससुर के अपना पिण्ड दान देले रहली।
फल्गु नदी केतकी  फूल  गाय के  श्राप देले  रहली।।

सात पुस्त ले तर  जाला गया जी धाम  गइला से।
पूर्वज लो का मिले मुक्ति फल्गु नदी में नहइला से।।

अपने  देश   ले  नाहीं उहवाँ  विदेश  के   लोग  भी  आवेला।
पिण्ड दान अवरू पूजा क के पितरन क मोक्ष दिलावेला।।

मात पिता सभके तारे कुल खानदान तर जाला हो।
पिण्ड दान करे वाला के  परमगति मिल  जाला हो।।

गया शहर के  पूर्वी छोर प ऊ  फल्गु  नदी  बहेले।
माता सीता के श्रापित वस जल भीतरी लेके रहेले।।

वायु पुराण में फल्गु के मान गंगा जी से जयादा दिहल बा।
गंगा जी अस  बा  पवितर   ओके  फल्गु  तीरथ  कहल  बा।।

पितर लोग गद  गद हो जाला ई सभका  करे  के  चाहीं  काम।
बूढ़, पुरनियाँ जे घर के होखे ओकरा जाए के चाहीं गया धाम।।

गया नाँव के असुर  एगो अत्याचारी  रहे  बड़ा  बलवान।
विष्णु भगवान जे के गदा से मरले जानेला सगरो जहान।।

भक्ति यज्ञ श्राद्ध पिण्डदान नहान जे गया जी में करी।
भगवान विष्णु गदाधर के  दर्शन से ऊ  त जाई  तरी।।

गौतम  बुद्ध  का  ज्ञान  ओही  मिलल  रहे  गया  में।
आसन लगा के  बइठस रहस वटवृक्ष का छाया में।।

फरबs फुलबs आगे बढबs  करबs  जदि सम्मान।
आदर सत्कार कइल करs दीपक बाँटत रहs ज्ञान।।

दीपक  तिवारी,
श्रीकरपुर, सिवान।